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सौर मंडल बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम वर्ष 2022 में भारत ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र खासकर अंतरिक्ष के क्षेत्र में काफी सफलता हासिल की है। पिछले एक साल में भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र तेजी से बदल रहा है। पिछले दिनों इसरो ने भारत के पहले निजी रॉकेट ‘विक्रम-एस’ का श्रीहरिकोटा में सफल प्रक्षेपण किया था। एक और अभियान में इसरो ने हाल में ही पीएसएलवी-सी54 के जरिए ओशनसैट-3 और आठ लघु उपग्रह- भूटानसैट, पिक्सेल का ‘आनंद’, धुव अंतरिक्ष के दो थायबोल्ट और स्पेसफ्लाइट यूएसए के चार एस्ट्रोकास्ट-लॉन्च किए। अक्टूबर महीनें में इसरो ने ब्रिटिश कंपनी वनवेब के लिए 36 कृत्रिम उपग्रहों को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित करके एक बड़ी सफलता हासिल की थी।इसरो ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में काफी सफलता हासिल कर लिया है, लेकिन अब समय आ गया है जब इसरो व्यावसायिक सफलता के साथ अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की तरह अंतरिक्ष अन्वेषण पर भी ध्यान दे। इसरो को अंतरिक्ष अन्वेषण और शोध के लिए दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी, क्योंकि जैसे-जैसे अंतरिक्ष के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी अंतरिक्ष अन्वेषण बेहद महत्त्वपूर्ण होता जाएगा। इस काम इसके लिए सरकार को इसरो का सालाना बजट भी बढ़ाना पड़ेगा, जो फिलहाल नासा के मुकाबले काफी कम है। भारी विदेशी उपग्रहों को अधिक संख्या में प्रक्षेपित करने के लिए अब हमें पीएसएलवी के साथ-साथ जीएसएलवी रॉकेट का भी उपयोग करना होगा। पीएसएलवी अपनी सटीकता के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है, लेकिन ज्यादा भारी उपग्रहों के लिए जीएसएलवी का प्रयोग अब बहुतायत में करना होगा। वैसे तो भारत के पहले सफल चंद्र मिशन और मंगल मिशन के बाद से ही इसरो व्यावसायिक तौर पर काफी सफल रहा है और इसरों के प्रक्षेपण की बेहद कम लागत की वजह से दुनिया भर के कई देश अब इसरो से अपने उपग्रहों की लांचिंग करा रहे हैं। अंतरिक्ष बाजार में भारत के लिए संभावनाएं बढ़ रही है, इसने अमेरिका सहित कई बड़े देशों का एकाधिकार तोड़ा है। पिछले दिनों दुश्मन मिसाइल को हवा में ही नष्ट करनें की क्षमता वाली इंटरसेप्टर मिसाइल का सफल प्रक्षेपण इस बात का सबूत है कि भारत बैलेस्टिक मिसाइल रक्षा तंत्र के विकास में भी बड़ी कामयाबी हासिल कर चुका है। दुश्मन के बैलिस्टिक मिसाइल को हवा में ही ध्वस्त करने के लिए भारत ने सुपरसोनिक इंटरसेप्टर मिसाइल बना कर दुनिया के विकसित देशों की नींद उड़ा दी है। एक समय ऐसा भी था जब अमेरिका ने भारत के उपग्रहों को लांच करने से मन कर दिया था। आज स्थिति ये है कि अमेरिका सहित तमाम देश खुद भारत के साथ व्यावसायिक समझौता करने को इच्छुक हैं। अब पूरी दुनिया में सेटेलाइट के माध्यम से टेलीविजन प्रसारण, मौसम की भविष्यवाणी और का दूरसंचार का क्षेत्र बहुत तेज गति से बढ़ रहा है और चूंकि ये सभी सुविधाएं उपग्रहों के माध्यम से संचालित होती हैं। इसलिए संचार उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करने की मांग में बढ़ोतरी हो रही है। हालांकि इस क्षेत्र में चीन, रूस, जापान आदि देश प्रतिस्पर्धा में हैं, लेकिन यह बाजार इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि यह मांग उनके सहारे पूरी नहीं की जा सकती। ऐसे में व्यावसायिक तौर पर यहां भारत के लिए बहुत संभावनाएं है। कम लागत और सफलता की गारंटी इसरो की सबसे बड़ी ताकत है जिसकी वजह से स्पेस इंडस्ट्री में आने वाला समय भारत के एकाधिकार का होगा। याद करिए कि नवम्बर 2007 में रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रॉसकॉसमॉस ने कहा था कि वह चंद्रयान-2 प्रोजेक्ट में भारत के साथ काम करते हुए इसरो को लैंडर देगा। जनवरी 2013 में लॉन्चिंग तय थी, लेकिन रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रॉसकॉसमॉस लैंडर नहीं दे पाई या नहीं दिया। बाद में भारत ने खुद अपना लैंडर-रोवर बनाया। इस बात से यह साफ हो गया कि हमारे वैज्ञानिक किसी के मोहताज नहीं हैं। वे कोई भी मिशन पूरा कर सकते हैं। अब तो अमेरिका भी अपने सैटेलाइट लॉन्चिंग के लिए भारत की लगातार मदद ले रहा है, जो अंतरिक्ष बाजार में भारत की धमक का स्पष्ट संकेत है। वास्तव में नियमित रूप से विदेशी उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण ‘भारत की अंतरिक्ष क्षमता की वैश्विक अभिपुष्टि’ है। अमेरिका की फ्यूट्रान कॉरपोरेशन की एक शोध रिपोर्ट भी बताती है कि अंतरिक्ष जगत के बड़े देशों के बीच का अंतरराष्ट्रीय सहयोग रणनीतिक तौर पर भी सराहनीय है। वास्तव में इस क्षेत्र में किसी के साथ सहयोग या भागीदारी सभी पक्षों के लिए लाभदायक स्थिति है। इससे बड़े पैमाने पर लगने वाले संसाधनों का बंटवारा हो जाता है। खासतौर पर इसमें होने वाले भारी खर्च का। यह भारतीय अंतरिक्ष उद्योग की वाणिज्यिक प्रतिस्पर्धा की श्रेष्ठता का गवाह भी है। भारत जल्दी ही चंद्रमा पर अपना तीसरा मिशन चंद्रयान-3 लॉन्च कर सकता है। चंद्रयान-3; चंद्रयान-2 का उत्तराधिकारी है और यह चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग का प्रयास करेगा। इसरो के अनुसार, चंद्रयान-3 से संबंधित टीम का गठन किया जा चुका है और इस मिशन पर सुचारू रूप से कार्य प्रारंभ है। इसरो के अनुसार चंद्रयान-3 का मुख्य उद्देश्य ऐसी खोज करना है जिससे भारत के साथ ही पूरी मानवता को फायदा होगा। इन परीक्षणों और अनुभवों के आधार पर ही भावी चंद्र अभियानों की तैयारी में जरूरी बड़े बदलाव होंगे। ताकि भविष्य के चंद्र अभियानों की नई टेक्नोलॉजी को बनाने और उन्हें तय करने में मदद मिले। मिशन के मुख्य उद्देश्यों में चंद्रमा पर पानी की मात्रा का अनुमान लगाना, उसके जमीन, उसमें मौजूद खनिजों एवं रसायनों तथा उनके वितरण का अध्ययन करना, उसकी भूकंपीय गतिविधियों का अध्ययन और चंद्रमा के बाहरी वातावरण की ताप-भौतिकी गुणों का विश्लेषण है। कुल मिलाकर चंद्रयान-3 मिशन भारत के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है साथ ही यह मिशन भविष्य में अंतरिक्ष शोध की नई संभावनाओं को भी जन्म देगा। भारत अंतरिक्ष क्षेत्र में नई सफलताएं हासिल कर विकास को अधिक गति दे सकता है। देश में गरीबी दूर करने और विकसित भारत के सपने को पूरा करने में इसरो काफी मददगार साबित हो सकता है। अब समय आ गया है जब इसरो व्यावसायिक सफलता के साथ-साथ नासा की तरह अंतरिक्ष अन्वेषण और शोध पर भी ज्यादा ध्यान दे, जिससे की भारत के साथ साथ दुनिया को भी नई दिशा मिल सके।

सौर मंडल

बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम

वर्ष 2022 में भारत ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र खासकर अंतरिक्ष के क्षेत्र में काफी सफलता हासिल की है। पिछले एक साल में भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र तेजी से बदल रहा है।  पिछले दिनों इसरो ने भारत के पहले निजी रॉकेट ‘विक्रम-एस’ का श्रीहरिकोटा में सफल प्रक्षेपण किया था। एक और अभियान में इसरो ने  हाल में ही पीएसएलवी-सी54 के जरिए ओशनसैट-3 और आठ लघु उपग्रह- भूटानसैट, पिक्सेल का ‘आनंद’, धुव अंतरिक्ष के दो थायबोल्ट और स्पेसफ्लाइट यूएसए के चार एस्ट्रोकास्ट-लॉन्च किए। अक्टूबर महीनें में इसरो ने  ब्रिटिश कंपनी वनवेब के लिए 36 कृत्रिम उपग्रहों को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित करके एक बड़ी सफलता हासिल की थी।इसरो ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में काफी सफलता हासिल कर लिया है, लेकिन अब समय आ गया है जब इसरो व्यावसायिक सफलता के साथ अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की तरह अंतरिक्ष अन्वेषण पर भी ध्यान दे। इसरो को अंतरिक्ष अन्वेषण और शोध के लिए दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी, क्योंकि जैसे-जैसे अंतरिक्ष के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी अंतरिक्ष अन्वेषण बेहद महत्त्वपूर्ण होता जाएगा। इस काम इसके लिए सरकार को इसरो का सालाना बजट भी बढ़ाना पड़ेगा, जो फिलहाल नासा के मुकाबले काफी कम है। भारी विदेशी उपग्रहों को अधिक संख्या में प्रक्षेपित करने के लिए अब हमें पीएसएलवी के साथ-साथ जीएसएलवी रॉकेट का भी उपयोग करना होगा।


पीएसएलवी अपनी सटीकता के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है, लेकिन ज्यादा भारी उपग्रहों के लिए जीएसएलवी का प्रयोग अब बहुतायत में करना होगा। वैसे तो भारत के पहले सफल चंद्र मिशन और मंगल मिशन के बाद से ही इसरो व्यावसायिक तौर पर काफी सफल रहा है और इसरों के प्रक्षेपण की बेहद कम लागत की वजह से दुनिया भर के कई देश अब इसरो से अपने उपग्रहों की लांचिंग करा रहे हैं। अंतरिक्ष बाजार में भारत के लिए संभावनाएं बढ़ रही है, इसने अमेरिका सहित कई बड़े देशों का एकाधिकार तोड़ा है। पिछले दिनों दुश्मन मिसाइल को हवा में ही नष्ट करनें की क्षमता वाली इंटरसेप्टर मिसाइल का सफल प्रक्षेपण इस बात का सबूत है कि भारत  बैलेस्टिक मिसाइल रक्षा तंत्र के विकास में भी बड़ी कामयाबी हासिल कर चुका है।


दुश्मन के बैलिस्टिक मिसाइल को हवा में ही ध्वस्त करने के लिए भारत ने सुपरसोनिक इंटरसेप्टर मिसाइल बना कर दुनिया के विकसित देशों की नींद उड़ा दी है। एक समय ऐसा भी था जब अमेरिका ने भारत के उपग्रहों को लांच करने से मन कर दिया था। आज स्थिति ये है कि अमेरिका सहित तमाम देश खुद भारत के साथ व्यावसायिक समझौता करने को इच्छुक हैं। अब पूरी दुनिया में सेटेलाइट के माध्यम से टेलीविजन प्रसारण, मौसम की भविष्यवाणी और  का दूरसंचार का क्षेत्र बहुत तेज गति से बढ़ रहा है और चूंकि ये सभी सुविधाएं उपग्रहों के माध्यम से संचालित होती हैं। इसलिए संचार उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करने की मांग में बढ़ोतरी हो रही है। हालांकि इस क्षेत्र में चीन, रूस, जापान आदि देश प्रतिस्पर्धा में हैं, लेकिन यह बाजार इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि यह मांग उनके सहारे पूरी नहीं की जा सकती।


ऐसे में व्यावसायिक तौर पर यहां भारत के लिए बहुत संभावनाएं है। कम लागत और सफलता की गारंटी इसरो की सबसे बड़ी ताकत है जिसकी वजह से स्पेस इंडस्ट्री में आने वाला समय भारत के एकाधिकार का होगा। याद करिए कि नवम्बर 2007 में रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रॉसकॉसमॉस ने कहा था कि वह चंद्रयान-2 प्रोजेक्ट में भारत के साथ काम करते हुए इसरो को लैंडर देगा। जनवरी 2013 में लॉन्चिंग तय थी, लेकिन रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रॉसकॉसमॉस लैंडर नहीं दे पाई या नहीं दिया। बाद में भारत ने खुद अपना लैंडर-रोवर बनाया। इस बात से यह साफ हो गया कि हमारे वैज्ञानिक किसी के मोहताज नहीं हैं। वे कोई भी मिशन पूरा कर सकते हैं। अब तो अमेरिका भी अपने सैटेलाइट लॉन्चिंग के लिए भारत की लगातार मदद ले रहा है, जो अंतरिक्ष बाजार में भारत की धमक का स्पष्ट संकेत है। वास्तव में नियमित रूप से विदेशी उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण ‘भारत की अंतरिक्ष क्षमता की वैश्विक अभिपुष्टि’ है।  अमेरिका की फ्यूट्रान कॉरपोरेशन की एक शोध रिपोर्ट भी बताती है कि अंतरिक्ष जगत के बड़े देशों के बीच का अंतरराष्ट्रीय सहयोग रणनीतिक तौर पर भी सराहनीय है।


वास्तव में इस क्षेत्र में किसी के साथ सहयोग या भागीदारी सभी पक्षों के लिए लाभदायक स्थिति है। इससे बड़े पैमाने पर लगने वाले संसाधनों का बंटवारा हो जाता है। खासतौर पर इसमें होने वाले भारी खर्च का। यह भारतीय अंतरिक्ष उद्योग की वाणिज्यिक प्रतिस्पर्धा की श्रेष्ठता का गवाह भी है। भारत जल्दी ही चंद्रमा पर अपना तीसरा मिशन चंद्रयान-3 लॉन्च कर सकता है। चंद्रयान-3; चंद्रयान-2 का उत्तराधिकारी है और यह चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग का प्रयास करेगा। 


इसरो के अनुसार, चंद्रयान-3 से संबंधित टीम का गठन किया जा चुका है और इस मिशन पर सुचारू रूप से कार्य प्रारंभ है। इसरो के अनुसार चंद्रयान-3  का मुख्य उद्देश्य ऐसी खोज करना है जिससे भारत के साथ ही पूरी मानवता को फायदा होगा। इन परीक्षणों और अनुभवों के आधार पर ही भावी चंद्र अभियानों की तैयारी में जरूरी बड़े बदलाव होंगे। ताकि भविष्य के चंद्र अभियानों की नई टेक्नोलॉजी को बनाने और उन्हें तय करने में मदद मिले। मिशन के मुख्य उद्देश्यों में चंद्रमा पर पानी की मात्रा का अनुमान लगाना, उसके जमीन, उसमें मौजूद खनिजों एवं रसायनों तथा उनके वितरण का अध्ययन करना, उसकी भूकंपीय गतिविधियों का अध्ययन और चंद्रमा के बाहरी वातावरण की ताप-भौतिकी गुणों का विश्लेषण है।



कुल मिलाकर चंद्रयान-3 मिशन भारत के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है साथ ही यह मिशन भविष्य में अंतरिक्ष शोध की नई संभावनाओं को भी जन्म देगा। भारत अंतरिक्ष क्षेत्र में नई सफलताएं हासिल कर विकास को अधिक गति दे सकता है। देश में गरीबी दूर करने और विकसित भारत के सपने को पूरा करने में इसरो काफी मददगार साबित हो सकता है।  अब समय आ गया है जब इसरो व्यावसायिक सफलता के साथ-साथ नासा की तरह अंतरिक्ष अन्वेषण और शोध पर भी ज्यादा ध्यान दे, जिससे की भारत के साथ साथ दुनिया को भी नई दिशा मिल सके।

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मंगल ग्रह पर क्या कभी परमाणु युद्ध हुआ था? क्या वहाँ कभी इंसान रहते थे? By Vnita kasnia Punjab मंगल ग्रह के चित्र को अगर आप देखते हैं तो आप पाएंगे कि मंगल ग्रह पर कुछ अजीब लाइंस खींची हुई है जो कि वाकई बहुत डरावनी और अजीब है।सबसे अजीब बात यह है कि यह इतनी बड़ी दूरी में बनी हुई है, कि इसे आसानी के साथ चित्र में देखा जा सकता है ( इस आर्टिकल्स के साथ मैंने कुछ चित्र को भी साझा किया है जो आप को समझने में मदद करेंगी ) कि मैं किस लाइंस की बात कर रहा हूं यह लाइंस इतनी बड़ी है जितना बड़ा पूरा रूस का भाग है जोकि देखने में प्राकृतिक बिल्कुल नहीं लगती।प्राचीन अंतरिक्ष विचारक भी मंगल ग्रह पर जीवन होने का दावा करते हैं माया सभ्यता ने भी मंगल ग्रह पर कभी जीवन होने की बात कही थी ।आधुनिक साइंटिस्ट मानते हैं कि मंगल ग्रह पर पृथ्वी की ही तरह जीवन था और टेक्नोलॉजिकल एडवांसमेंट जैसा कि हम पृथ्वी पर इस दौर में अनुभव कर रहे हैं उससे भी कहीं अधिक एडवांस टेक्नोलॉजी मंगल ग्रह पर कभी हुई थी ।जैसा कि हम देख सकते हैं, आज के समय में हम परमाणु हथियारों से घिरे हुए हैं हर देश के पास कोई ना कोई एटॉमिक या परमाणु हथियार मौजूद है या होने वाला है और जो तेजी से बढ़ रहा है ।अंतरिक्ष विचारक मानते हैं कि मंगल ग्रह पर भी वहा के निवासियों में तनाव होने के बाद युद्ध हुआ होगा जिसमें मंगल ग्रह और वहां के निवासी तबाह हो गए, यह बातें बहुत गहन अध्ययन के बाद और मंगल की संरचना को देखने पर कही गई हालांकि इस बात पर कभी सत्यापन की मुहर नहीं लगी।कुछ अंतरिक्ष विचारकों का यह भी मानना है कि युद्ध के दौरान कुछ मंगल निवासी पृथ्वी पर आ गए और पृथ्वी कोई अपना निवास स्थान मान लिया। कुछ समय पहले इस पर एक प्रोग्राम जो "हिस्ट्री टीवी" पर आता है "एन्शियंट एलियन" में कही गई इस पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की गई जो कि अंतरिक्ष विद्वानों द्वारा बनाई गई थी।क्या यह सच है ? कि एक एडवांस सभ्यता एक एटॉमिक युद्ध में पूरी तरीके से समाप्त हो सकती है, क्योंकि नासा के वैज्ञानिकों ने भी मंगल की धरती पर रेडियो एक्टिव पार्टिकल्स प्राप्त किए जो कि काफी हद तक इशारा करते हैं कि मंगल ग्रह पर परमाणु युद्ध हुआ था।कुछ महीने पहले नासा के "आॉपरचुनेटी" रोवर ने बहुत सारी ऐसी कड़ियां पाई जो यह स्थिति को दर्शाती है कि मंगल ग्रह पर कुछ तो ऐसा हुआ था जिसकी वजह से वहां का पूरा प्रारूप ही बदल गया नासा ने यह माना है कि मंगल ग्रह पर कभी पानी मौजूद था हालांकि नासा मानता है कि हो सकता है अभी भी सॉलिड या आइस कैप्स की संरचना में पानी मंगल ग्रह पर सतह के नीचे मौजूद हो अगर मंगल ग्रह पर पानी मिल जाता है तो मंगल ग्रह को पृथ्वी की ही तरह फिर से बचाया जा सकता है क्योंकि मंगल और पृथ्वी में बहुत अंतर नहीं है चाहे वह वातावरण से संबंधित या फिर भौगोलिक स्थिति से संबंधित क्यों ना हो।क्या आपको लगता है ? कि हमारी दुनिया भी ऐसे ही एक परमाणु युद्ध की तरफ बढ़ रही है कुछ दिनों पहले ईरान ने (जो एक परमाणु देश नहीं है उसने) भी अमेरिका के ऊपर परमाणु हमला करने की बात कही इस बात से हम क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं क्या ईरान के पास भी परमाणु हथियार है जो ईरान ने दुनिया के नजरों से छुपा कर रखा है भूतकाल में भी ऐसी कई घटनाओं ने पूरी दुनिया को खतरे में डाल दिया था जैसे कि जापान पर दो परमाणु हमला।vnitakasniapunjab05114@gmail.comऔर भी बहुत सारी जानकारियां इस बात को और पुख्ता बनाती है कि मंगल ग्रह पर भी कभी जीवन था जो किसी भयानक स्थिति में मंगल ग्रह के जीवन को खत्म करके सन्नाटा छोड़ गया।ज्यादा जानकारी के लिए आप एंशियंट एलियंश सीज़न 14 - "न्युक्लियर वार्स आॉन मार्स" देख सकते हैं।अगर आपको यह जानकारी पसंद आई तो आप अपवोट कर के मुझे और लिखने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं।धन्यवाद।

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