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क्या क्वान्टम फिजिक्स ही दुनिया का अंतिम सत्य है या अभी और भी कुछ विज्ञान में बदलाव संभव है? By वनिता कासनियां पंजाबनोट : पाठक कृपया धैर्यपूर्वक पढ़े।भौतिक विज्ञान कोई अंतिम सार्वभौमिक सत्य खोजने का विज्ञान नहीं है। अन्य विज्ञानों की तरह भौतिकी में हम एक ऐसी सैद्धांतिक समझ विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं जो हमें यह समझने की में मदद करेगा कि पूरे ब्रह्मांड में चीजें कैसे और क्यों काम कर रही हैं। क्यों एक इलेक्ट्रॉन एक इलेक्ट्रॉन है और न्यूट्रॉन ऐसा व्यवहार करता है जैसे उसे किसी चीज की परवाह नहीं है। गुरुत्वाकर्षण क्या है? और क्यों; यह हमेशा आकर्षित करता है। हम सिर्फ यह समझना चाहते हैं कि पदार्थ, स्पेस, समय, अस्तित्व और उनका अंतर संबंध क्या है, और हमारे प्रश्न के सभी उत्तर खोजने के बाद शायद किसी दिन हम यह भी समझेंगे कि हम यहां क्यों हैं? और हम ब्रह्मांड और अस्तित्व के इस समीकरण में कैसे फिट होते हैं?दार्शनिक और धर्म ऐसा हजारों वर्षों से करते आ रहे हैं। वे अपने-अपने सिद्धांत विकसित करके अनुमान लगाने की कोशिश करने लगे और इस प्रक्रिया में इतने सारे मूलभूत और मौलिक प्रश्न गढ़ लिए गए है। वास्तविकता की प्रकृति(नेचर ऑफ़ रियलिटी) के बारे में, मानव अस्तित्व के बारे में , चंद्रमा और सूर्य क्या है और उनका शेड्यूल क्यों है? दिन और रात की प्रक्रिया कैसे होती है और तारे क्या हैं? मानव का उद्देश्य क्या है और जीवन का उद्भव कैसे हुआ? इन्ही धर्मो और दर्शनों में एक; ब्रह्मांडीय सत्ता (Cosmic Entity ) का विचार उत्पन्न हुआ जो प्रकृति, वास्तविकता(रियलिटी) और मानव जाति के चारों ओर घटित सभी क्रियाकलापो को नियंत्रित करती है। वह सभी प्रश्न, मुद्दे और घटनाएं जिसे तत्कालीन सीमित ज्ञान से समझाया नहीं जा सका, उनकी बागडोर उस काल्पनिक परम सत्ता के हाथ में दे दी गई।इसके लिए उन्होंने परम् सत्ता के चारों ओर किताबें, कहानियाँ और लोककथाएँ बनाईं। वे उन्हें नाम से पुकारने लगे, पूजा करने लगे, क़ुरबानी(स्व-संतुष्टि के लिये हत्या) करने लगे और अधिकांश समय अपने अलग-अलग विश्वासों के लिए एक-दूसरे से लड़ने लगे। उदाहरण के लिए सूर्य को लीजिये: मिस्र के लोग इसे भगवान 'रा' कहते हैं, हिंदू इसे 'सूर्य भगवान' कहते हैं, चीनी इसे 'यान-दी' कहते हैं और ग्रीक इसे 'हेलिओस' कहते है और सितारे आकाश की चादर में छेद हैं। थंडर और बारिश प्राचीन स्लाव धर्म में पेरुन ,ओडिन के पुत्र भगवान थोर या देवताओ के राजा इंद्र या ज़ीयूस(Zeus) के कारण होती है।लेकिन हमको निश्चित तौर से अब पता है कि सूर्य हमारे सौर मंडल के केंद्र में एक 4.5 अरब साल पुराना पीला बौना तारा है - हाइड्रोजन और हीलियम की एक गर्म चमकती हुई गेंद जो पृथ्वी से लगभग 93 मिलियन मील दूर है और यह हमारे सौर मंडल का एकमात्र तारा है। जिसके बिना हमारे हमारे गृह पर जीवन मौजूद नहीं हो सकता, और बिजली बादल और जमीन के बीच होने वाले इलेक्ट्रोस्टैटिक डिस्चार्ज से ज्यादा कुछ नहीं है।अपने परिवेश और दैनिक आधार पर होने वाली प्राकृतिक घटनाओं के बारे में अपने ज्ञान का विस्तार करना ही दिन प्रतिदिन उठते प्रश्नो और जिज्ञासाओं को निष्कर्ष तक पहुंचाने का रास्ता है। अवलोकन के विज्ञान की मौलिक समस्या इन्द्रियों की अपनी सीमा है। इस से ऊपर आकर प्राकृतिक परिवेश और घटना को समझने के लिए गणितीय विधि और उपकरणों की आवश्यकता होती है।सामान्य रूप से जो हाई स्कूल विज्ञान आप पढ़ते है उसको कहते है क्लासिकल फिजिक्स जिसका एक बहुत बड़ा हिस्सा 'सर आइजक न्यूटन' ने विकसित किया था जिसे हम Newtonian मैकेनिक्स (क्लासिकल यांत्रिकी\मैकेनिक्स) कहते है। भौतिक विज्ञान की इस इस शाखा में हम द्रव्यमान और बल के मध्य होनी वाली क्रियाओ और उनसे यांत्रिक घटनाओ(Mechanical Phenomena) का विस्तृत अध्ययन करते है। इसका विकास उन्होंने अपनी पुस्तक "फिलॉसफी, नेचुरलिस प्रिंसिपिया मैथमैटिका(Philosophiæ Naturalis Principia Mathematica) में किया था। इसके लिए उन्होंने कलन (कैलकुलस) का मौजूदा रूप रचा और इतना सटीक की आज लगभग ~335 वर्ष पश्चात् भी भौतिक विज्ञान और गणित में मैकेनिक्स का श्रीगणेश नये विद्यार्थियों के लिए सर न्यूटन से ही होता है। यह सिद्धांत इतने सुदृढ़ है की 16वी सदी के उत्तरार्ध से आज तक यह सभी मूलभूत प्राकृतिक घटनाओं, ग्रहों और पिंडो की गति, उनके नियम , द्रव्यमान और बल से उत्पन्न यांत्रिक समस्याओ , प्रणोद, बैलेस्टिक, फ्लूइड इत्यादि समस्याओ का समाधान करने के लिए पर्याप्त है। चीजे ऊपर से नीचे कैसे गिरती है, गोली और रॉकेट की गति कैसे होती है, घर्षण गति को कैसे प्रभावित करता है और हम फिसलते कब है इत्यादि। मतलब जब तक एक बड़े पिंड (10 की घात माइनस 9 से ऊपर)की बात हो रही है और उसकी गति प्रकाश की गति से बहुत बहुत बहुत कम है। इसको कहते है "मैक्रोस्कोपिक स्टडी ऑफ़ ऑब्जेक्ट"।यहाँ पर न्यूटन के गति के नियमों के अनुप्रयोग आधार है। दूरी, समय और द्रव्यमान की अवधारणाएँ निरपेक्ष हैं और समय और स्थिति अनुसार नहीं बदलती है। ऐसा नहीं है की 200 साल तक लगातार भौतिक विज्ञान में कोई तरक्की नहीं हुई और ऐसी समस्याओ से भी पाला नहीं पड़ा जो क्लासिकल मैकेनिक्स से समझाई नहीं जा सकती थी। 19वी शताब्दी के अंत तक वैधुत चुंबकीय सिद्धांतो के बारे में विज्ञान जगत को बहुत सारे प्रश्न भरे थे। पिंड की गति प्रकाश की गति के निकट होती Newtonian मैकेनिक्स फ़ैल हो जाता है। भयंकर द्रव्यमान और गुरूत्वाकर्षण, स्पेस-टाइम को समझने में भी न्यूटन की यांत्रिकी अ-प्रभावी है। परमाणु सिद्धांतो की आधारभूत व्याख्या आप नहीं कर सकते है।1905 में बर्न में स्विस पेटेंट कार्यालय में क्लास 3 के एक 26 वर्षीय क्लर्क, अल्बर्ट आइंस्टीन ने पांच शोध पत्र जर्मन पत्रिका 'एनालेन डेर फिजिक' में प्रकाशित किए। इन क्रांतिकारी विचारों ने भौतिक विज्ञान को बदल कर रख दिया और एक नये प्रकार के मैकेनिक्स की उत्पत्ति हुई। इसको कहा जाता है सापेक्ष यांत्रिकी(रेलटीवीस्टिक मैकेनिक्स) जो बताता है कि स्थान और समय सापेक्ष हैं और सभी प्रकार की गति संदर्भ फ्रेम(फ्रेम ऑफ़ रेफेरेंस(F.O.R )) के सापेक्ष होनी चाहिए। भौतिकी के नियमो में कोई बदलाव नहीं होता है वह ब्रह्माण्ड में सभी स्थानों पर सामान है और प्रकश की गति एक नियतांक है। कुछ भी इससे तेज नहीं जा सकता है वरना भौतिकी के नियम टूट जाते है। इस आधारशिला पर बने रेलटीवीस्टिक फिजिक्स ने भौतिक विज्ञान का स्वरूप ही बदल दिया। एक हिस्सा था जनरल रिलेटिविटी(GTR) और दूसरा हिस्सा था स्पेशल रिलेटिविटी(STR)। यहाँ पिंड, कण, आप और में प्रकाश की गति के आस-पास बिना भौतिकी के नियम तोड़े गतिमान हो सकता है।जनरल रिलेटिविटी द्वारा भारी द्रव्यमान का स्पेस-टाइम पर प्रभाव को समझाया जा सका की कोई अदृश्य शक्ति नहीं खींच रही है , द्रव्यमान स्पेस टाइम के ताने-बाने को मोड़ता है और जितना द्रव्यमान उतना ही गुरुत्वाकर्षण प्रबल होगा। गुरुत्वाकर्षण का अन्य फिजिकल phenomenon के साथ संबध इस क्षेत्र में किया जाता है। वही स्पेशल रिलेटिविटी(STR) गुरुत्वाकर्षण की अनुपस्थिति में सभी भौतिक घटनाओं पर सापेक्षिता के नियम लगाने का विज्ञान है। प्रसिद्ध ऊर्जा द्रव्यमान सम्बन्ध (E = mc^2) STR से उत्पन्न होता है। GTR मतलब F.O.R. का प्रकाश की गति के आस-पास त्वरण और STR मतलब एक F.O.R. की नियत गति से है। मतलब की बड़े पिंडो(10 की घात माइनस 9 से ऊपर ) की बात हो रही है जिनकी गति प्रकाश की गति के आस पास है।Source : Google Imageतब उपरोक्त 2 प्रकार के मैकेनिक्स में आपने प्रकृति की कार्यविधि को समझने के लिए इन्द्रिय अवलोकन से आगे आकर जटिल और नये गणितीय सिद्धांतो तक की रचना की है। बावजूद इसके की आप और हम ग्रहो, गुरुत्वाकर्षण और भौतिक जगत के बड़े मानदंडों को समझने काबिल हो गए है। सूक्ष्म जगत को समझने की लिए हमारे पास अभी भी कोई भी टूल नहीं है।20वीं सदी के पूर्वार्ध आई कई बड़ी भौतिक विज्ञान समस्या जैसे ब्लैकबॉडी रेडिएशन, हाइड्रोजन एटम, नेचर ऑफ़ लाइट, हाईज़ेनबर्ग माइक्रोस्कोप और अनिश्चितता सिद्धांत, क्वांटम इंटरफेरेंस और जाने कितने ही परमाण्वीय समस्याओ को सुलझाने के लिए हमारे पास कोई युक्ति नहीं थी। हमारे पास तो परमाण्वीय मॉडल तक नहीं था। जैसे ग्रहो और दिखाई दे सकने वाले पिंडो की सापेक्षिक और निरपेक्ष गति समझने के लिए Relativistic और Newtonian मैकेनिक्स है।उसी प्रकार 1900 के बाद से लगातार सूक्ष्म जगत को समझने के लिए जिस नए प्रकार के मेकेनिक्स का निर्माण किया गया उसको हम बोलते है "क्वांटम मैकेनिक्स" , अर्थात "माइक्रोस्कोपिक दुनिया में काम आने वाले यांत्रिकी सिद्धांतो का विज्ञान", मतलब 10 की घात माइनस 9 से सूक्ष्म मैटर जिसकी गति प्रकाश की गति से बहुत बहुत बहुत कम है।20वीं सदी में आते ही इसकी शुरुवात 1900 में जर्मन वैज्ञानिक मैक्स प्लांक ने ब्लैक बॉडी रेडिएशन के स्पेक्ट्रम को सरल करने के साथ की थी। 26 वर्षीय आइंस्टीन ने 1905 के अपने प्रसिद्ध शोध पत्र श्रृंखला में मैक्स प्लांक के कार्य को आधार बनाकर के प्रकाश विधुत प्रभाव की व्याख्या की और प्रकाश को ऊर्जा के छोटे से बण्डल "फोटोन" के रूप में सबके सामने प्रस्तुत किया। रदरफोर्ड ने इसी आधार पर "गीगर-मार्सडेन प्रयोग" (प्रख्यात स्वर्ण पन्नी प्रयोग) की व्याख्या करते हुए पहला विस्तृत एटॉमिक मॉडल दिया। ठीक 4 साल बाद 1909 में 'जेफ्री इनग्राम टेलर' ने यह प्रदर्शित किया कि प्रकाश के इंटरफेरेंस पैटर्न तब भी उत्पन्न होते है जब प्रकाश ऊर्जा में केवल एक फोटॉन शामिल था। (यह याद रखना आगे काम आयेगा।)1913 में मिलिकन का आयल बूँद प्रयोग, फिर 1913 में ही जेम्स बोर का परमाणु मॉडल, 1913 से 1922 तक की कई खोज और फिर 1922 में ऑथर कॉम्प्टन का 'कॉम्प्टन स्कैटरिंग' प्रयोग, उसी वर्ष स्टर्न-गेरलाच प्रयोग, फिर 1924 में इस मैदान में भारतीय बुद्धि का आगमन और प्लांक के नियम को एक नये प्रकार के सांख्यिकी के साथ प्रस्तुत करके बोसॉन कणो की भविष्वाणी "श्री सत्येंद्र नाथ बोस" ने की जो आगे चलकर बोस-आइंस्टीन सांख्यिकी से प्रसिद्ध हुआ और पदार्थ की पांचवी अवस्था "बोस-आइंस्टीन कंडेंनसेट" की खोज का मूलाधार बना। उसी वर्ष वोल्फगैंग पाउली ने "पाउली का अपवर्जन सिद्धांत" दिया।25 वर्षो बाद 1925 में इन सभी कार्यो को आधारशिला बनाकर "वर्नर हाइजेनबर्ग, मैक्स बॉर्न और पास्कुअल जॉर्डन ने क्वांटम यांत्रिकी के मैट्रिक्स मैकेनिक्स का सूत्रीकरण और विकास किया। 1926 में श्री एर्विन श्रोडिंगर ने वेव फंक्शन गणित रचा और इस प्रकार "आधुनिक क्वांटम फिजिक्स" की लगभग 97 वर्ष पहले आधारशिला रखी गई। 1926 से 1932 तक जॉन वॉन न्यूमैन ने हिल्बर्ट स्पेस पर हर्मिटियन ऑपरेटरों का उपयोग करके क्वांटम यांत्रिकी की गणितीय नींव रखी। 6 साल बाद 1932 में क्वांटम यांत्रिकी की पहली मौलिक पाठ्यपुस्तक प्रकाशित हुई। (90 साल पहले)अब आप समझ पा रहे होंगे की क्वांटम फिजिक्स कोई एक दम से उत्पन्न होने वाला चमत्कारिक विज्ञान नहीं है। ~120 वर्षो से अधिक किये जा रहे सतत प्रयासों का परिणाम है। इसका विकास भौतिक विज्ञान की अन्य शाखाओं की तरह ही एक मौलिक भौतिक विज्ञान की समस्या को सुलझाने के लिए किया गया, कि किस प्रकार सूक्ष्मजगत में घटित होने वाले नियमों और गतिविधियों के अध्ययन किया जा सकता है। इसीलिए जब में कहता हू की मैजोरिटी ऑडियंस विज्ञान को नहीं समझती है उसका कारण यह है की आप जो देख रहे है "टिप ऑफ़ द आइसबर्ग" ही है। अभी क्वांटम फिजिक्स कोई आज कल में पैदा नहीं हुआ है। यह दुनिया समझने का गणितीय यंत्र है। इससे सिद्धांतो ने हमें इंजीनियरिंग के साथ मिलकर "सेमीकंडक्टर" दिए और सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी का युग शुरू हुआ। आपके स्मार्ट फ़ोन, डिजिटल घडी, कंप्यूटर, उपग्रह संचार प्रणाली,जीपीएस, लेज़र , MRI, परमाणु घडी, नुक्लिअर एनर्जी और लगभग हर सर्किट से चलने वाली चीज सब क्वांटम फिजिक्स की देन है। यह टेक्सटबुक्स आपके सीधे काम में नहीं आती है पर क्वांटम फिजिक्स ने हमारा जीवन ऐसे बदला है।Source : Google Imageतब आपका प्रश्न : " क्या क्वान्टम फिजिक्स ही दुनिया का अंतिम सत्य है या अभी और भी कुछ विज्ञान में बदलाव संभव है?" का जवाब यह है की"क्वांटम फिजिक्स एक माइक्रोस्कोपिक दुनिया में ऐसे कणों के अध्ययन का विज्ञान है , जिनकी व्याख्या Newtonian मैकेनिक्स या Relativistic मैकेनिक्स से नहीं की जा सकती है। पदार्थ और प्रकाश के प्रभाव,एटॉमिक और सब एटॉमिक पार्टिकल के अध्ययन के लिए और प्रकृति को उपपरमाण्विक स्तर पर समझने के लिए इस विशेष भौतिक विज्ञान का निर्माण किया गया। यह ब्रह्मांड की क्रिया विधि को समझने की 4 मुख्य मैकेनिक्स सिद्धांतो में से एक है।वह है क्रमश: Newtonian मैकेनिक्स,Relativistic मैकेनिक्स, क्वांटम मैकेनिक्स और क्वांटम फील्ड थ्योरी।diag :क्वांटम थ्योरी भौतिकी में मौलिक प्रक्रियाओं का अत्यंत सटीक विवरण प्रदान करती है। क्वांटम सिद्धांत के डायरेक्ट एक्सपेरिमेंट ज्यादातर सूक्ष्म डोमेन(उपपरमाण्वीय कणों) तक ही सीमित हैं। उसके बावजूद क्वांटम सिद्धांत को आमतौर पर लगभग सार्वभौमिक रूप से मान्य माना जाता है। इसका उपयोग कण और ठोस अवस्था भौतिकी में मूलभूत प्रक्रियाओं का वर्णन करने के लिए तो किया ही जाता है इसके आलावा इसका उपयोग ब्रह्मांडीय माइक्रोवेव पृष्ठभूमि या ब्लैक होल के विकिरण की व्याख्या करने के लिए भी किया जाता है। क्वांटम सिद्धांत विस्तृत स्तर पर भौतिकी की कई जटिल समस्याओ की व्याख्या कर देता है और परीक्षणों में सफल और वैध है। तो एक प्रकार से यह एक पूर्ण विकसित और सफल सिद्धांत है परन्तु सूक्ष्म कणों जिनकी गति प्रकाश की गति के आस-पास है उनकी व्याख्या के लिए क्वांटम मैकेनिक्स के उन्नत स्वरूप "क्वांटम फील्ड थ्योरी(QFT) " की आवश्यकता पड़ती है। QFT जब सार्थक है जब क्वांटम मैकेनिक्स many डिग्री ऑफ़ फ्रीडम वाले क्वांटम व्यवहार को नहीं समझा पाती है।" सीधे सीधे चर्चा करू तो यह प्रयास है उपरोक्त तीनो पूर्वर्ती सिद्धांतो को एक साथ समयोजित करने का ताकि एक मुख्य सिद्धांत की प्राप्ति हो सके जो हमें मैक्रो और माइक्रोस्कोपिक दुनिया एक ही फ्रेमवर्क में समझा सके।" ऐसा प्रयास आइंस्टीन ने यूनिफाइड फील्ड थ्योरी(UFT) के माध्यम से करने का प्रयास किया। स्ट्रिंग थ्योरी और M -थ्योरी इसका आधुनिक प्रयास है। एक ही फ्रेमवर्क में संपूर्ण ब्रह्माण्ड को समझने प्रयास ही दरअसल थ्योरी ऑफ़ एवरीथिंग ,है। यह भौतिक विज्ञान की एक अनसुलझी पहेली है।इस प्रकार आपने देखा की 100 वर्षो से विकसित होते इस सिद्धांत की अपनी अनेको खूबिया और कुछ सीमाएं है। इसके अध्ययन में कही भी किसी "अंतिम सत्य" की चर्चा नहीं हो रही है और जैसा की आप देख सकते है विज्ञान में बदलाव अपरिहार्य है, क्योकि विज्ञान नहीं बदलता है , बदलाव भी विज्ञान के आधारशिला का एक पत्थर है। बदलाव से यहाँ आशय है की "नए प्रयोगों, डेटा और गणितीय सिद्धांतों के साथ चलते हुए पूर्व प्रचलित वैज्ञानिक नियम और सिद्धांत या तो कसौटी पर खरे उतरते है या उनमे बदलाव करने या उन्हें पूर्णत ख़ारिज करने की आवश्यकता है, ताकि इंजीनियरिंग और अन्य विज्ञान शाखाओं के साथ मिलकर नए अन्वेषण किये जा सके। कुछ भी जड़ नहीं रहना चाहिये और आधारहीन परिकल्पना के दम पर किसी प्रकार के विश्वास मत या वैज्ञानिक कल्ट का निर्माण नहीं होना चाहिये।व्यक्तिगत टिप्पणी : यह समझना जरुरी है की इतने मौलिक विज्ञान की जब भी हमारे भारतीय समाज में चर्चा होती है तब हमेशा आध्यात्म और धर्म के किसी सिद्धांत के फर्जी वेलिडेशन के लिए क्वांटम फिजिक्स का उपयोग किया जाता है। दूर-दूर तक इस विज्ञान को सीखकर जन-मानस और राष्ट्र उत्थान चर्चा का विषय नहीं होता है। विषय होता है "फलाने बाबा ने कहा है/फलाने धर्म ग्रंथ में लिखा है/फलानी आसमानी किताब और प्रभु के वचनों वाली किताब में लिखा है की फलाना फलाना सिद्धांत सीधा आधुनिक क्वांटम फिजिक्स जैसा है। मतलब अभी क्वांटम फिजिक्स जहां पंहुचा है वह तो हमारे सूफी/गुरु-बाबा/पादरी पहले से ही पहुंच चुके है। हमारा धर्म या दीन सुपीरियर है और अब हमको पश्चिम से जरुरत नहीं है। अब चलो कुछ नहीं सीखते है और हुड़दंग मचाते है। 100 साल पुराने सिद्ध विज्ञान मैं से अपने धार्मिक विश्वास की मान्यता को सिद्ध करने के लिए उसके साथ तोड़मरोड़ और विखंडन विधि जैसे रास्ते अपनाए जाते हैं। ताकि किसी प्रकार से अपने धर्म की सार्थकता को आधुनिक विज्ञान के सांचे में बिठा दिया जाए। इस मूर्खतापूर्ण कार्य से इसे सबसे बड़ी समस्या छद्म विज्ञान को बढ़ावा मिलता है। अगर विद्यार्थी को धार्मिक ग्रंथों में उपस्थित विज्ञान मैं भरोसा होगा तब एडवांस फिजिक्स पढ़कर नैनो मैटेरियल ऊपर मौलिक कार्य करने का उसका कोई मन नहीं होगा। क्योंकि वह सब पहले से ही दीन की किताबो में लिख दिया है। वह जीवनभर उस कचरे में अपना सर मारता रहेगा, लेकिन उसके हाथ कुछ नहीं लगेगा।कारण ? क्योकि वह ऐसा कुछ है ही नहीं। जैसे-जैसे ये नमूने नये-नये साइंटिफिक शब्द सीखते है इनके धर्म का विज्ञान स्तर बढ़ता जाता है। आप हमेशा देखोगे की यह छद्मविज्ञान मंडली अपनी-अपनी धार्मिक किताबो से क्वांटम फील्ड थ्योरी, सुपर सिमिट्री, ब्लैक होल रेडिएशन और वैदिक UFO निकालते मिल जायेंगे। पर आप कभी नहीं देखोगे इन्हे यह कहते हुए की इनकी किताबो में सेट थ्योरी और प्रायिकता के सम्बन्ध में लिखा है, संवेग संरक्षण का नियम लिखा है, उष्मागतिकी का शून्य नियम लिखा है या कोशिकीय संरचना और पादप तंत्रिका तंत्र के बारे में लिखा है। यह लेकर आते है सीधा एडवांस फिजिक्स ! कारण ? फेंको तो लम्बी फेंको वरना क्या मजा और दूसरा इन्हे दरअसल पता है नहीं है भारतीय बुद्धि का वैज्ञानिक योगदान कितना सूक्षम, आधारभूत और मौलिक है।इन्हे धातुकर्म, डिस्टिलेशन, शल्य चिकित्सा, स्टेलर मैपिंग, सेलेस्टियल नेविगेशन, प्लेन और गोलीय त्रिकोणमिति, alchemy और दर्शन में भारतीय योगदान का कोई ज्ञान नहीं है। यह हीन भावना से ग्रसित है और वेस्ट से वेलिडेशन की मांग करने वाले ऊद-बिलावो का समूह है। आज इनको क्वांटम शब्द समझ आ गया। इसीलिये दीपक चोपड़ा क्वांटम consciousness बेच रहा है। कल को इन्हे कोई और शब्द पकड़ आ जायेगा तब ये उसको बेचेंगे।source : Google Image,अपने ज्ञान का विस्तार करने के लिए बुद्धिमान लोगों को एक विचार आया कि यदि हम किसी भी प्राकृतिक विचार के बारे में परिकल्पना प्रस्तावित करे। फिर उस परिकल्पना के समर्थन में साक्ष्य खोजने का प्रयास करें, कुछ प्रयोगात्मक संचालन करें और देखते हैं की क्या प्रयोगात्मक परिणाम, परिकल्पना की पुष्टि करते है ? यदि ऐसा होता है और विभिन्न मानदंडों पर सामान निष्कर्ष प्राप्त होते है तब इसे सिद्धांत या नियम के श्रेणी में रखा जायेगा। और यदि ऐसा नहीं होता है, तो तब तक परिकल्पना में सुधार और विचार की आवश्यकता होगी, जब तक कि सिद्धांत और प्रयोग दोनों से हमें एक समान परिणाम ना प्राप्त हो जाये। इतना ही नहीं कि प्रत्येक सिद्धांत और नव-प्रयोग, गणितीय और सैद्धांतिक दृष्टिकोणों पर आलोचना और परिक्षण के लिए खुला रहेगा। इसे ही वैज्ञानिक पद्धति के रूप में जाना जाता है। यही हमारे ज्ञानार्जन का मूल होना चाहिये

नोट : पाठक कृपया धैर्यपूर्वक पढ़े।

भौतिक विज्ञान कोई अंतिम सार्वभौमिक सत्य खोजने का विज्ञान नहीं है। अन्य विज्ञानों की तरह भौतिकी में हम एक ऐसी सैद्धांतिक समझ विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं जो हमें यह समझने की में मदद करेगा कि पूरे ब्रह्मांड में चीजें कैसे और क्यों काम कर रही हैं। क्यों एक इलेक्ट्रॉन एक इलेक्ट्रॉन है और न्यूट्रॉन ऐसा व्यवहार करता है जैसे उसे किसी चीज की परवाह नहीं है। गुरुत्वाकर्षण क्या है? और क्यों; यह हमेशा आकर्षित करता है। हम सिर्फ यह समझना चाहते हैं कि पदार्थ, स्पेस, समय, अस्तित्व और उनका अंतर संबंध क्या है, और हमारे प्रश्न के सभी उत्तर खोजने के बाद शायद किसी दिन हम यह भी समझेंगे कि हम यहां क्यों हैं? और हम ब्रह्मांड और अस्तित्व के इस समीकरण में कैसे फिट होते हैं?


दार्शनिक और धर्म ऐसा हजारों वर्षों से करते आ रहे हैं। वे अपने-अपने सिद्धांत विकसित करके अनुमान लगाने की कोशिश करने लगे और इस प्रक्रिया में इतने सारे मूलभूत और मौलिक प्रश्न गढ़ लिए गए है। वास्तविकता की प्रकृति(नेचर ऑफ़ रियलिटी) के बारे में, मानव अस्तित्व के बारे में , चंद्रमा और सूर्य क्या है और उनका शेड्यूल क्यों है? दिन और रात की प्रक्रिया कैसे होती है और तारे क्या हैं? मानव का उद्देश्य क्या है और जीवन का उद्भव कैसे हुआ? इन्ही धर्मो और दर्शनों में एक; ब्रह्मांडीय सत्ता (Cosmic Entity ) का विचार उत्पन्न हुआ जो प्रकृति, वास्तविकता(रियलिटी) और मानव जाति के चारों ओर घटित सभी क्रियाकलापो को नियंत्रित करती है। वह सभी प्रश्न, मुद्दे और घटनाएं जिसे तत्कालीन सीमित ज्ञान से समझाया नहीं जा सका, उनकी बागडोर उस काल्पनिक परम सत्ता के हाथ में दे दी गई।

इसके लिए उन्होंने परम् सत्ता के चारों ओर किताबें, कहानियाँ और लोककथाएँ बनाईं। वे उन्हें नाम से पुकारने लगे, पूजा करने लगे, क़ुरबानी(स्व-संतुष्टि के लिये हत्या) करने लगे और अधिकांश समय अपने अलग-अलग विश्वासों के लिए एक-दूसरे से लड़ने लगे। उदाहरण के लिए सूर्य को लीजिये: मिस्र के लोग इसे भगवान 'रा' कहते हैं, हिंदू इसे 'सूर्य भगवान' कहते हैं, चीनी इसे 'यान-दी' कहते हैं और ग्रीक इसे 'हेलिओस' कहते है और सितारे आकाश की चादर में छेद हैं। थंडर और बारिश प्राचीन स्लाव धर्म में पेरुन ,ओडिन के पुत्र भगवान थोर या देवताओ के राजा इंद्र या ज़ीयूस(Zeus) के कारण होती है।

लेकिन हमको निश्चित तौर से अब पता है कि सूर्य हमारे सौर मंडल के केंद्र में एक 4.5 अरब साल पुराना पीला बौना तारा है - हाइड्रोजन और हीलियम की एक गर्म चमकती हुई गेंद जो पृथ्वी से लगभग 93 मिलियन मील दूर है और यह हमारे सौर मंडल का एकमात्र तारा है। जिसके बिना हमारे हमारे गृह पर जीवन मौजूद नहीं हो सकता, और बिजली बादल और जमीन के बीच होने वाले इलेक्ट्रोस्टैटिक डिस्चार्ज से ज्यादा कुछ नहीं है।


अपने परिवेश और दैनिक आधार पर होने वाली प्राकृतिक घटनाओं के बारे में अपने ज्ञान का विस्तार करना ही दिन प्रतिदिन उठते प्रश्नो और जिज्ञासाओं को निष्कर्ष तक पहुंचाने का रास्ता है। अवलोकन के विज्ञान की मौलिक समस्या इन्द्रियों की अपनी सीमा है। इस से ऊपर आकर प्राकृतिक परिवेश और घटना को समझने के लिए गणितीय विधि और उपकरणों की आवश्यकता होती है।

सामान्य रूप से जो हाई स्कूल विज्ञान आप पढ़ते है उसको कहते है क्लासिकल फिजिक्स जिसका एक बहुत बड़ा हिस्सा 'सर आइजक न्यूटन' ने विकसित किया था जिसे हम Newtonian मैकेनिक्स (क्लासिकल यांत्रिकी\मैकेनिक्स) कहते है। भौतिक विज्ञान की इस इस शाखा में हम द्रव्यमान और बल के मध्य होनी वाली क्रियाओ और उनसे यांत्रिक घटनाओ(Mechanical Phenomena) का विस्तृत अध्ययन करते है। इसका विकास उन्होंने अपनी पुस्तक "फिलॉसफी, नेचुरलिस प्रिंसिपिया मैथमैटिका(Philosophiæ Naturalis Principia Mathematica) में किया था। इसके लिए उन्होंने कलन (कैलकुलस) का मौजूदा रूप रचा और इतना सटीक की आज लगभग ~335 वर्ष पश्चात् भी भौतिक विज्ञान और गणित में मैकेनिक्स का श्रीगणेश नये विद्यार्थियों के लिए सर न्यूटन से ही होता है। यह सिद्धांत इतने सुदृढ़ है की 16वी सदी के उत्तरार्ध से आज तक यह सभी मूलभूत प्राकृतिक घटनाओं, ग्रहों और पिंडो की गति, उनके नियम , द्रव्यमान और बल से उत्पन्न यांत्रिक समस्याओ , प्रणोद, बैलेस्टिक, फ्लूइड इत्यादि समस्याओ का समाधान करने के लिए पर्याप्त है। चीजे ऊपर से नीचे कैसे गिरती है, गोली और रॉकेट की गति कैसे होती है, घर्षण गति को कैसे प्रभावित करता है और हम फिसलते कब है इत्यादि। मतलब जब तक एक बड़े पिंड (10 की घात माइनस 9 से ऊपर)की बात हो रही है और उसकी गति प्रकाश की गति से बहुत बहुत बहुत कम है। इसको कहते है "मैक्रोस्कोपिक स्टडी ऑफ़ ऑब्जेक्ट"

यहाँ पर न्यूटन के गति के नियमों के अनुप्रयोग आधार है। दूरी, समय और द्रव्यमान की अवधारणाएँ निरपेक्ष हैं और समय और स्थिति अनुसार नहीं बदलती है। ऐसा नहीं है की 200 साल तक लगातार भौतिक विज्ञान में कोई तरक्की नहीं हुई और ऐसी समस्याओ से भी पाला नहीं पड़ा जो क्लासिकल मैकेनिक्स से समझाई नहीं जा सकती थी। 19वी शताब्दी के अंत तक वैधुत चुंबकीय सिद्धांतो के बारे में विज्ञान जगत को बहुत सारे प्रश्न भरे थे। पिंड की गति प्रकाश की गति के निकट होती Newtonian मैकेनिक्स फ़ैल हो जाता है। भयंकर द्रव्यमान और गुरूत्वाकर्षण, स्पेस-टाइम को समझने में भी न्यूटन की यांत्रिकी अ-प्रभावी है। परमाणु सिद्धांतो की आधारभूत व्याख्या आप नहीं कर सकते है।


1905 में बर्न में स्विस पेटेंट कार्यालय में क्लास 3 के एक 26 वर्षीय क्लर्क, अल्बर्ट आइंस्टीन ने पांच शोध पत्र जर्मन पत्रिका 'एनालेन डेर फिजिक' में प्रकाशित किए। इन क्रांतिकारी विचारों ने भौतिक विज्ञान को बदल कर रख दिया और एक नये प्रकार के मैकेनिक्स की उत्पत्ति हुई। इसको कहा जाता है सापेक्ष यांत्रिकी(रेलटीवीस्टिक मैकेनिक्स) जो बताता है कि स्थान और समय सापेक्ष हैं और सभी प्रकार की गति संदर्भ फ्रेम(फ्रेम ऑफ़ रेफेरेंस(F.O.R )) के सापेक्ष होनी चाहिए। भौतिकी के नियमो में कोई बदलाव नहीं होता है वह ब्रह्माण्ड में सभी स्थानों पर सामान है और प्रकश की गति एक नियतांक है। कुछ भी इससे तेज नहीं जा सकता है वरना भौतिकी के नियम टूट जाते है। इस आधारशिला पर बने रेलटीवीस्टिक फिजिक्स ने भौतिक विज्ञान का स्वरूप ही बदल दिया। एक हिस्सा था जनरल रिलेटिविटी(GTR) और दूसरा हिस्सा था स्पेशल रिलेटिविटी(STR)। यहाँ पिंड, कण, आप और में प्रकाश की गति के आस-पास बिना भौतिकी के नियम तोड़े गतिमान हो सकता है।

जनरल रिलेटिविटी द्वारा भारी द्रव्यमान का स्पेस-टाइम पर प्रभाव को समझाया जा सका की कोई अदृश्य शक्ति नहीं खींच रही है , द्रव्यमान स्पेस टाइम के ताने-बाने को मोड़ता है और जितना द्रव्यमान उतना ही गुरुत्वाकर्षण प्रबल होगा। गुरुत्वाकर्षण का अन्य फिजिकल phenomenon के साथ संबध इस क्षेत्र में किया जाता है। वही स्पेशल रिलेटिविटी(STR) गुरुत्वाकर्षण की अनुपस्थिति में सभी भौतिक घटनाओं पर सापेक्षिता के नियम लगाने का विज्ञान है। प्रसिद्ध ऊर्जा द्रव्यमान सम्बन्ध (E = mc^2) STR से उत्पन्न होता है। GTR मतलब F.O.R. का प्रकाश की गति के आस-पास त्वरण और STR मतलब एक F.O.R. की नियत गति से है। मतलब की बड़े पिंडो(10 की घात माइनस 9 से ऊपर ) की बात हो रही है जिनकी गति प्रकाश की गति के आस पास है।

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तब उपरोक्त 2 प्रकार के मैकेनिक्स में आपने प्रकृति की कार्यविधि को समझने के लिए इन्द्रिय अवलोकन से आगे आकर जटिल और नये गणितीय सिद्धांतो तक की रचना की है। बावजूद इसके की आप और हम ग्रहो, गुरुत्वाकर्षण और भौतिक जगत के बड़े मानदंडों को समझने काबिल हो गए है। सूक्ष्म जगत को समझने की लिए हमारे पास अभी भी कोई भी टूल नहीं है।

20वीं सदी के पूर्वार्ध आई कई बड़ी भौतिक विज्ञान समस्या जैसे ब्लैकबॉडी रेडिएशन, हाइड्रोजन एटम, नेचर ऑफ़ लाइट, हाईज़ेनबर्ग माइक्रोस्कोप और अनिश्चितता सिद्धांत, क्वांटम इंटरफेरेंस और जाने कितने ही परमाण्वीय समस्याओ को सुलझाने के लिए हमारे पास कोई युक्ति नहीं थी। हमारे पास तो परमाण्वीय मॉडल तक नहीं था। जैसे ग्रहो और दिखाई दे सकने वाले पिंडो की सापेक्षिक और निरपेक्ष गति समझने के लिए Relativistic और Newtonian मैकेनिक्स है।

उसी प्रकार 1900 के बाद से लगातार सूक्ष्म जगत को समझने के लिए जिस नए प्रकार के मेकेनिक्स का निर्माण किया गया उसको हम बोलते है "क्वांटम मैकेनिक्स" , अर्थात "माइक्रोस्कोपिक दुनिया में काम आने वाले यांत्रिकी सिद्धांतो का विज्ञान", मतलब 10 की घात माइनस 9 से सूक्ष्म मैटर जिसकी गति प्रकाश की गति से बहुत बहुत बहुत कम है।

20वीं सदी में आते ही इसकी शुरुवात 1900 में जर्मन वैज्ञानिक मैक्स प्लांक ने ब्लैक बॉडी रेडिएशन के स्पेक्ट्रम को सरल करने के साथ की थी। 26 वर्षीय आइंस्टीन ने 1905 के अपने प्रसिद्ध शोध पत्र श्रृंखला में मैक्स प्लांक के कार्य को आधार बनाकर के प्रकाश विधुत प्रभाव की व्याख्या की और प्रकाश को ऊर्जा के छोटे से बण्डल "फोटोन" के रूप में सबके सामने प्रस्तुत किया। रदरफोर्ड ने इसी आधार पर "गीगर-मार्सडेन प्रयोग" (प्रख्यात स्वर्ण पन्नी प्रयोग) की व्याख्या करते हुए पहला विस्तृत एटॉमिक मॉडल दिया। ठीक 4 साल बाद 1909 में 'जेफ्री इनग्राम टेलर' ने यह प्रदर्शित किया कि प्रकाश के इंटरफेरेंस पैटर्न तब भी उत्पन्न होते है जब प्रकाश ऊर्जा में केवल एक फोटॉन शामिल था। (यह याद रखना आगे काम आयेगा।)

1913 में मिलिकन का आयल बूँद प्रयोग, फिर 1913 में ही जेम्स बोर का परमाणु मॉडल, 1913 से 1922 तक की कई खोज और फिर 1922 में ऑथर कॉम्प्टन का 'कॉम्प्टन स्कैटरिंग' प्रयोग, उसी वर्ष स्टर्न-गेरलाच प्रयोग, फिर 1924 में इस मैदान में भारतीय बुद्धि का आगमन और प्लांक के नियम को एक नये प्रकार के सांख्यिकी के साथ प्रस्तुत करके बोसॉन कणो की भविष्वाणी "श्री सत्येंद्र नाथ बोस" ने की जो आगे चलकर बोस-आइंस्टीन सांख्यिकी से प्रसिद्ध हुआ और पदार्थ की पांचवी अवस्था "बोस-आइंस्टीन कंडेंनसेट" की खोज का मूलाधार बना। उसी वर्ष वोल्फगैंग पाउली ने "पाउली का अपवर्जन सिद्धांत" दिया।


25 वर्षो बाद 1925 में इन सभी कार्यो को आधारशिला बनाकर "वर्नर हाइजेनबर्ग, मैक्स बॉर्न और पास्कुअल जॉर्डन ने क्वांटम यांत्रिकी के मैट्रिक्स मैकेनिक्स का सूत्रीकरण और विकास किया। 1926 में श्री एर्विन श्रोडिंगर ने वेव फंक्शन गणित रचा और इस प्रकार "आधुनिक क्वांटम फिजिक्स" की लगभग 97 वर्ष पहले आधारशिला रखी गई। 1926 से 1932 तक जॉन वॉन न्यूमैन ने हिल्बर्ट स्पेस पर हर्मिटियन ऑपरेटरों का उपयोग करके क्वांटम यांत्रिकी की गणितीय नींव रखी। 6 साल बाद 1932 में क्वांटम यांत्रिकी की पहली मौलिक पाठ्यपुस्तक प्रकाशित हुई। (90 साल पहले)


अब आप समझ पा रहे होंगे की क्वांटम फिजिक्स कोई एक दम से उत्पन्न होने वाला चमत्कारिक विज्ञान नहीं है। ~120 वर्षो से अधिक किये जा रहे सतत प्रयासों का परिणाम है। इसका विकास भौतिक विज्ञान की अन्य शाखाओं की तरह ही एक मौलिक भौतिक विज्ञान की समस्या को सुलझाने के लिए किया गया, कि किस प्रकार सूक्ष्मजगत में घटित होने वाले नियमों और गतिविधियों के अध्ययन किया जा सकता है। इसीलिए जब में कहता हू की मैजोरिटी ऑडियंस विज्ञान को नहीं समझती है उसका कारण यह है की आप जो देख रहे है "टिप ऑफ़ द आइसबर्ग" ही है। अभी क्वांटम फिजिक्स कोई आज कल में पैदा नहीं हुआ है। यह दुनिया समझने का गणितीय यंत्र है। इससे सिद्धांतो ने हमें इंजीनियरिंग के साथ मिलकर "सेमीकंडक्टर" दिए और सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी का युग शुरू हुआ। आपके स्मार्ट फ़ोन, डिजिटल घडी, कंप्यूटर, उपग्रह संचार प्रणाली,जीपीएस, लेज़र , MRI, परमाणु घडी, नुक्लिअर एनर्जी और लगभग हर सर्किट से चलने वाली चीज सब क्वांटम फिजिक्स की देन है। यह टेक्सटबुक्स आपके सीधे काम में नहीं आती है पर क्वांटम फिजिक्स ने हमारा जीवन ऐसे बदला है।

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तब आपका प्रश्न : " क्या क्वान्टम फिजिक्स ही दुनिया का अंतिम सत्य है या अभी और भी कुछ विज्ञान में बदलाव संभव है?" का जवाब यह है की

"क्वांटम फिजिक्स एक माइक्रोस्कोपिक दुनिया में ऐसे कणों के अध्ययन का विज्ञान है , जिनकी व्याख्या Newtonian मैकेनिक्स या Relativistic मैकेनिक्स से नहीं की जा सकती है। पदार्थ और प्रकाश के प्रभाव,एटॉमिक और सब एटॉमिक पार्टिकल के अध्ययन के लिए और प्रकृति को उपपरमाण्विक स्तर पर समझने के लिए इस विशेष भौतिक विज्ञान का निर्माण किया गया। यह ब्रह्मांड की क्रिया विधि को समझने की 4 मुख्य मैकेनिक्स सिद्धांतो में से एक है।

वह है क्रमश: Newtonian मैकेनिक्स,Relativistic मैकेनिक्स, क्वांटम मैकेनिक्स और क्वांटम फील्ड थ्योरी।

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क्वांटम थ्योरी भौतिकी में मौलिक प्रक्रियाओं का अत्यंत सटीक विवरण प्रदान करती है। क्वांटम सिद्धांत के डायरेक्ट एक्सपेरिमेंट ज्यादातर सूक्ष्म डोमेन(उपपरमाण्वीय कणों) तक ही सीमित हैं। उसके बावजूद क्वांटम सिद्धांत को आमतौर पर लगभग सार्वभौमिक रूप से मान्य माना जाता है। इसका उपयोग कण और ठोस अवस्था भौतिकी में मूलभूत प्रक्रियाओं का वर्णन करने के लिए तो किया ही जाता है इसके आलावा इसका उपयोग ब्रह्मांडीय माइक्रोवेव पृष्ठभूमि या ब्लैक होल के विकिरण की व्याख्या करने के लिए भी किया जाता है। क्वांटम सिद्धांत विस्तृत स्तर पर भौतिकी की कई जटिल समस्याओ की व्याख्या कर देता है और परीक्षणों में सफल और वैध है। तो एक प्रकार से यह एक पूर्ण विकसित और सफल सिद्धांत है परन्तु सूक्ष्म कणों जिनकी गति प्रकाश की गति के आस-पास है उनकी व्याख्या के लिए क्वांटम मैकेनिक्स के उन्नत स्वरूप "क्वांटम फील्ड थ्योरी(QFT) " की आवश्यकता पड़ती है। QFT जब सार्थक है जब क्वांटम मैकेनिक्स many डिग्री ऑफ़ फ्रीडम वाले क्वांटम व्यवहार को नहीं समझा पाती है।" सीधे सीधे चर्चा करू तो यह प्रयास है उपरोक्त तीनो पूर्वर्ती सिद्धांतो को एक साथ समयोजित करने का ताकि एक मुख्य सिद्धांत की प्राप्ति हो सके जो हमें मैक्रो और माइक्रोस्कोपिक दुनिया एक ही फ्रेमवर्क में समझा सके।" ऐसा प्रयास आइंस्टीन ने यूनिफाइड फील्ड थ्योरी(UFT) के माध्यम से करने का प्रयास किया। स्ट्रिंग थ्योरी और M -थ्योरी इसका आधुनिक प्रयास है। एक ही फ्रेमवर्क में संपूर्ण ब्रह्माण्ड को समझने प्रयास ही दरअसल थ्योरी ऑफ़ एवरीथिंग ,है। यह भौतिक विज्ञान की एक अनसुलझी पहेली है।



इस प्रकार आपने देखा की 100 वर्षो से विकसित होते इस सिद्धांत की अपनी अनेको खूबिया और कुछ सीमाएं है। इसके अध्ययन में कही भी किसी "अंतिम सत्य" की चर्चा नहीं हो रही है और जैसा की आप देख सकते है विज्ञान में बदलाव अपरिहार्य है, क्योकि विज्ञान नहीं बदलता है , बदलाव भी विज्ञान के आधारशिला का एक पत्थर है। बदलाव से यहाँ आशय है की "नए प्रयोगों, डेटा और गणितीय सिद्धांतों के साथ चलते हुए पूर्व प्रचलित वैज्ञानिक नियम और सिद्धांत या तो कसौटी पर खरे उतरते है या उनमे बदलाव करने या उन्हें पूर्णत ख़ारिज करने की आवश्यकता है, ताकि इंजीनियरिंग और अन्य विज्ञान शाखाओं के साथ मिलकर नए अन्वेषण किये जा सके। कुछ भी जड़ नहीं रहना चाहिये और आधारहीन परिकल्पना के दम पर किसी प्रकार के विश्वास मत या वैज्ञानिक कल्ट का निर्माण नहीं होना चाहिये।


व्यक्तिगत टिप्पणी : यह समझना जरुरी है की इतने मौलिक विज्ञान की जब भी हमारे भारतीय समाज में चर्चा होती है तब हमेशा आध्यात्म और धर्म के किसी सिद्धांत के फर्जी वेलिडेशन के लिए क्वांटम फिजिक्स का उपयोग किया जाता है। दूर-दूर तक इस विज्ञान को सीखकर जन-मानस और राष्ट्र उत्थान चर्चा का विषय नहीं होता है। विषय होता है "फलाने बाबा ने कहा है/फलाने धर्म ग्रंथ में लिखा है/फलानी आसमानी किताब और प्रभु के वचनों वाली किताब में लिखा है की फलाना फलाना सिद्धांत सीधा आधुनिक क्वांटम फिजिक्स जैसा है। मतलब अभी क्वांटम फिजिक्स जहां पंहुचा है वह तो हमारे सूफी/गुरु-बाबा/पादरी पहले से ही पहुंच चुके है। हमारा धर्म या दीन सुपीरियर है और अब हमको पश्चिम से जरुरत नहीं है। अब चलो कुछ नहीं सीखते है और हुड़दंग मचाते है। 100 साल पुराने सिद्ध विज्ञान मैं से अपने धार्मिक विश्वास की मान्यता को सिद्ध करने के लिए उसके साथ तोड़मरोड़ और विखंडन विधि जैसे रास्ते अपनाए जाते हैं। ताकि किसी प्रकार से अपने धर्म की सार्थकता को आधुनिक विज्ञान के सांचे में बिठा दिया जाए। इस मूर्खतापूर्ण कार्य से इसे सबसे बड़ी समस्या छद्म विज्ञान को बढ़ावा मिलता है। अगर विद्यार्थी को धार्मिक ग्रंथों में उपस्थित विज्ञान मैं भरोसा होगा तब एडवांस फिजिक्स पढ़कर नैनो मैटेरियल ऊपर मौलिक कार्य करने का उसका कोई मन नहीं होगा। क्योंकि वह सब पहले से ही दीन की किताबो में लिख दिया है। वह जीवनभर उस कचरे में अपना सर मारता रहेगा, लेकिन उसके हाथ कुछ नहीं लगेगा।

कारण ? क्योकि वह ऐसा कुछ है ही नहीं। जैसे-जैसे ये नमूने नये-नये साइंटिफिक शब्द सीखते है इनके धर्म का विज्ञान स्तर बढ़ता जाता है। आप हमेशा देखोगे की यह छद्मविज्ञान मंडली अपनी-अपनी धार्मिक किताबो से क्वांटम फील्ड थ्योरी, सुपर सिमिट्री, ब्लैक होल रेडिएशन और वैदिक UFO निकालते मिल जायेंगे। पर आप कभी नहीं देखोगे इन्हे यह कहते हुए की इनकी किताबो में सेट थ्योरी और प्रायिकता के सम्बन्ध में लिखा है, संवेग संरक्षण का नियम लिखा है, उष्मागतिकी का शून्य नियम लिखा है या कोशिकीय संरचना और पादप तंत्रिका तंत्र के बारे में लिखा है। यह लेकर आते है सीधा एडवांस फिजिक्स ! कारण ? फेंको तो लम्बी फेंको वरना क्या मजा और दूसरा इन्हे दरअसल पता है नहीं है भारतीय बुद्धि का वैज्ञानिक योगदान कितना सूक्षम, आधारभूत और मौलिक है।

इन्हे धातुकर्म, डिस्टिलेशन, शल्य चिकित्सा, स्टेलर मैपिंग, सेलेस्टियल नेविगेशन, प्लेन और गोलीय त्रिकोणमिति, alchemy और दर्शन में भारतीय योगदान का कोई ज्ञान नहीं है। यह हीन भावना से ग्रसित है और वेस्ट से वेलिडेशन की मांग करने वाले ऊद-बिलावो का समूह है। आज इनको क्वांटम शब्द समझ आ गया। इसीलिये दीपक चोपड़ा क्वांटम consciousness बेच रहा है। कल को इन्हे कोई और शब्द पकड़ आ जायेगा तब ये उसको बेचेंगे।

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अपने ज्ञान का विस्तार करने के लिए बुद्धिमान लोगों को एक विचार आया कि यदि हम किसी भी प्राकृतिक विचार के बारे में परिकल्पना प्रस्तावित करे। फिर उस परिकल्पना के समर्थन में साक्ष्य खोजने का प्रयास करें, कुछ प्रयोगात्मक संचालन करें और देखते हैं की क्या प्रयोगात्मक परिणाम, परिकल्पना की पुष्टि करते है ? यदि ऐसा होता है और विभिन्न मानदंडों पर सामान निष्कर्ष प्राप्त होते है तब इसे सिद्धांत या नियम के श्रेणी में रखा जायेगा। और यदि ऐसा नहीं होता है, तो तब तक परिकल्पना में सुधार और विचार की आवश्यकता होगी, जब तक कि सिद्धांत और प्रयोग दोनों से हमें एक समान परिणाम ना प्राप्त हो जाये। इतना ही नहीं कि प्रत्येक सिद्धांत और नव-प्रयोग, गणितीय और सैद्धांतिक दृष्टिकोणों पर आलोचना और परिक्षण के लिए खुला रहेगा। इसे ही वैज्ञानिक पद्धति के रूप में जाना जाता है। यही हमारे ज्ञानार्जन का मूल होना चाहिये

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